Shiv Mishra Ji Ki Kalam Se
कविता-' वैधव्य' - (१)
- धर्मपाल अवस्थी
(मरघट' काव्य-कृति से संकलित। कृपया महाकवि निराला की 'विधवा' कविता के साथ मिलाकर पढ़ें।)
जीवन-पथ पर बिछे हुए हैं
पग-पग काँटे ही काँटे ।
सभी दुखी हैं उन काँटों से कौन व्यथा किसकी बाँटे ?
सभी दुखी हैं उन काँटों से कौन व्यथा किसकी बाँटे ?
काम-क्रोध के मूल यहाँ हैं, दम्भ - द्वेष के शूल यहाँ ।
अजब सफर जीवन का मिलते हैं पत्थर के फूल यहाँ ।
अजब सफर जीवन का मिलते हैं पत्थर के फूल यहाँ ।
परब्रह्म की तरह व्याप्त है
जग का कण्टक भ्रष्टाचार ।
छुआ -छूत पाखण्ड हवस के काँटे, काँटों की भरमार ।
छुआ -छूत पाखण्ड हवस के काँटे, काँटों की भरमार ।
संज्ञा और क्रिया दोनों ही
रूपों में जो 'खलता' है ।
उस दहेज काँटे का लालच भी घर - घर में पलता है ।
उस दहेज काँटे का लालच भी घर - घर में पलता है ।
यह समाज कितना विचित्र है, इसकी लीला क्या कहने ।
काँटा है वैधव्य मर्मभिद् फिर भी गहने सा पहने ।
काँटा है वैधव्य मर्मभिद् फिर भी गहने सा पहने ।
अब इन काँटों का वर्णन भी
सुन लो बारी - बारी से।
करता हूँ प्रारम्भ कथन मैं इस विधवा बेचारी से ।
करता हूँ प्रारम्भ कथन मैं इस विधवा बेचारी से ।
मरघट की आचरण संहिता न्यारी जग से होती है ।
यहाँ जागरण उन घड़ियों में जिनमें दुनियाँ सोती है ।
यहाँ जागरण उन घड़ियों में जिनमें दुनियाँ सोती है ।
बहती उल्टी हवा यहाँ तो
विरति जगे श्रृंगारों से ।
झलकें जल में अंगारे, रस रिसे कभी अंगारों से ।
झलकें जल में अंगारे, रस रिसे कभी अंगारों से ।
जब-जब दिख जाते अर्थी पर
सजे, सजाये
गये सुमन ।
फूलों के आगे हो जाती है शूलों की मात चुभन ।
फूलों के आगे हो जाती है शूलों की मात चुभन ।
किसी सुहागिन की अर्थी जब
चले किये सोलह श्रृंगार ।
अथवा नवें दिवस जब होता विधवा का अन्तिम श्रृंगार ।
अथवा नवें दिवस जब होता विधवा का अन्तिम श्रृंगार ।
किनके हृदय न डोले, आनन पड़े
नहीं किसके पीले ।
होते ये श्रृंगार देखकर नयन नहीं किनके गीले ।
होते ये श्रृंगार देखकर नयन नहीं किनके गीले ।
आह नहीं निकली किस मुख से
पनप न जाते किनके घाव।
ये अद्भुत श्रृंगार जगाते रति की जगह विरति के भाव।"
ये अद्भुत श्रृंगार जगाते रति की जगह विरति के भाव।"
नवें दिवस विधवा कुछ क्षण को खूब सजाई जाती है ।
दुःखदा क्रूर प्रथा ये अब भी वृथा निभाई जाती है ।
दुःखदा क्रूर प्रथा ये अब भी वृथा निभाई जाती है ।
बाली - पशुवत श्रृंगार
अश्रुजल से नहलाया जाता है ।
अनमन विधवा बलिवेदी पर उसे सजाया जाता है ।
अनमन विधवा बलिवेदी पर उसे सजाया जाता है ।
कुछ ऐसा लगता आँसू से भीगा यह श्रीहत श्रृंगार ।
खड़ा हुआ हो ज्यों बलिवेदी पर कोई बलिपशु लाचार ।
खड़ा हुआ हो ज्यों बलिवेदी पर कोई बलिपशु लाचार ।
फिर-फिर रगड़ी,फिर-फिर पोंछी और भिगोई जाती है ।
सरस महावर, माँग सिंदूरी ताजी धोई जाती है ।
सरस महावर, माँग सिंदूरी ताजी धोई जाती है ।
एक -एक गहना पहनाया और उतारा जाता है ।
तन-मन-अनलंकरण विपति का सविधि कराया जाता है ।
तन-मन-अनलंकरण विपति का सविधि कराया जाता है ।
विधवा की अभाग्य की
रेखा तभी और भी निखर गई ।
टूक-टूक हो जब हर चूड़ी धूलिकणों में बिखर गई ।
टूक-टूक हो जब हर चूड़ी धूलिकणों में बिखर गई ।
ये बिखरे मरघट पर शायद उन्हीं चूड़ियों के टुकड़े ।
खोए -खोए से अतीत की यादों को ढो रहे पड़े ।
खोए -खोए से अतीत की यादों को ढो रहे पड़े ।
सहयोगी थे कभी चाह से भरी हुई गलबाहों के।
आज वियोगी उन बाहों के भोगी अन्तर्दाहों के ।
आज वियोगी उन बाहों के भोगी अन्तर्दाहों के ।
रंग बिरंगे यों तो
प्रतिनिधि विविध रसों के लगते हैं ।
किन्तु देखकर इन्हें अन्ततः भाव करुण ही जगते हैं ।
किन्तु देखकर इन्हें अन्ततः भाव करुण ही जगते हैं ।
क्या बतलाएँ इन्हें
देखकर कितनी पीड़ा जगती है ।
बिखरी - बिखरी मरघट पर भवभूति -सम्पदा लगती है ।
बिखरी - बिखरी मरघट पर भवभूति -सम्पदा लगती है ।
किसी समय इनकी हर खनकन से रसकन से झरते थे ।
जलतरंग सी छेड़ कान में मानो अमिय बरसते थे।
जलतरंग सी छेड़ कान में मानो अमिय बरसते थे।
गलबाहों के ब्याज सजन
का कल जो प्यार चाहती थीं ।
कानों में कहकर छन – छन छन -छन अभिसार चाहती थीं।
कानों में कहकर छन – छन छन -छन अभिसार चाहती थीं।
चूर - चूर चूड़ियाँ वही
हा ! आज भूमि पर पड़ी हुई ।
मरघट की छाती पर निष्ठुर नियतिलेख सी जड़ी हुई ।...
मरघट की छाती पर निष्ठुर नियतिलेख सी जड़ी हुई ।...
यह चूड़ी तो मनिहारी ने दे असीस पहनाई थी ।
किसे पता था, कर में इसकी भी दो दिन पहुनाई थी ।
किसे पता था, कर में इसकी भी दो दिन पहुनाई थी ।
समझो नहीं काँच-कण इनको ये टुकड़े हैं प्राणों के ।
हिल - हिल जाते इनकी पीड़ा देख हृदय पाषाणों के ।
हिल - हिल जाते इनकी पीड़ा देख हृदय पाषाणों के ।
उधर न जाओ साथी ! मोड़ो इन कदमों को मोड़ो रे।
टूटे हुए जिगर के टुकड़े और इन्हें मत तोड़ो रे ।
टूटे हुए जिगर के टुकड़े और इन्हें मत तोड़ो रे ।
कभी महल की चहल पहल थे आज अंग वीरानों के ।
ये अवशेष बाल -विधवा के चूर - चूर अरमानों के ।
ये अवशेष बाल -विधवा के चूर - चूर अरमानों के ।
बिखरे हुए अश्रुकण हैं
ये किसी भाग्य की मारी के ।
तथाकथित भारत की गरिमा आदिशक्ति के नारी के ।
तथाकथित भारत की गरिमा आदिशक्ति के नारी के ।
स्वप्न हो गईं मनुहारों
की घड़ियाँ जिन अबलाओं की।
शेष रह गईं केवल यादें जिनकी प्रणय कथाओं की।
शेष रह गईं केवल यादें जिनकी प्रणय कथाओं की।
महज यातनाओं का सहना कुण्ठाओं का विष पीना ।
जीवन का अनिवार्य अङ्ग है जिनका घुट-घुट कर जीना।"
जीवन का अनिवार्य अङ्ग है जिनका घुट-घुट कर जीना।"
"जिसे न मरने अथवा जीने दें समाज के ठेकेदार ।
वह निरीह प्राणी विधवा है अंधरूढियों से लाचार ।
वह निरीह प्राणी विधवा है अंधरूढियों से लाचार ।
एक बार पतझर आने पर कभी न आ पाता मधुमास।
विधवा की जीवन-बगिया का अब तक रहा यही इतिहास।
विधवा की जीवन-बगिया का अब तक रहा यही इतिहास।
अंधकार छा जाता जीवन में चिराग के बुझते ही ।
ग्रहण उमंगों पर लग जाता है सुहाग के लुटते ही ।
ग्रहण उमंगों पर लग जाता है सुहाग के लुटते ही ।
बूझकर एक चिराग, किसी का सारा जीवन बुझा गया ।
लुट कर एक सुहाग किसी का सारा जीवन लुटा गया ।
लुट कर एक सुहाग किसी का सारा जीवन लुटा गया ।
सारी लिपि ललाट की धोकर चला गया जाने वाला ।
जीवन जो पीयूष -कलश था बना गया विष का प्याला ।
जीवन जो पीयूष -कलश था बना गया विष का प्याला ।
भूलुण्ठित मन -विहग
उमंगों वाली पाँखें गिर जातीं ।
दो आँखें क्या फिरें कि सारे जग की आँखें फिर जातीं ।
दो आँखें क्या फिरें कि सारे जग की आँखें फिर जातीं ।
दुर्बलता दीनता उदासी विधवे ! तेरे अलंकरण ।
दर्पण तक देखना हो गया मर्यादा का अतिक्रमण ।
दर्पण तक देखना हो गया मर्यादा का अतिक्रमण ।
गंगा सा पावन तन तेरा मन मानो निर्मल दर्पण।
किन्तु अमंगल अरे तपोमयि ! जग को तेरा मुखदर्शन ।
किन्तु अमंगल अरे तपोमयि ! जग को तेरा मुखदर्शन ।
जो समाज का तिरस्कार कर जा बैठें बाजारों में ।
उन्हें प्रशंसा मिले, उन्हीं का आदर हो दरबारों में ।
उन्हें प्रशंसा मिले, उन्हीं का आदर हो दरबारों में ।
अजब मान्यताएँ समाज की देख हो रहा हृदय दुखी ।
तपस्विनी ! तू अशुभदर्शिनी वेश्याएँ मंगला - मुखी ।
तपस्विनी ! तू अशुभदर्शिनी वेश्याएँ मंगला - मुखी ।
हँसी तुम्हारे लिये
जुर्म है प्रतिबन्धित अरमान सभी ।
खुशी तुम्हारी ज्यों दरिद्र के घर आये मेहमान कभी ।
खुशी तुम्हारी ज्यों दरिद्र के घर आये मेहमान कभी ।
तुझे विवशता कहूँ कि जग
की निष्ठुरता का रूप कहूँ ।
करुणा की साकार मूर्ति या जड़ता का प्रतिरूप कहूँ ।
करुणा की साकार मूर्ति या जड़ता का प्रतिरूप कहूँ ।
मानवता के साथ मनुज का तुझे क्रूर उपहास कहूँ ।
भारतीय विधवा कह लूँ या चलती - फिरती लाश कहूँ ।
भारतीय विधवा कह लूँ या चलती - फिरती लाश कहूँ ।
ये अन्धी बहरी दुनियाँ
तू किसके आगे रोती है ।
पगली ! मत रो, मत रो, आँसू क्यों मरुथल में बोती है ।
पगली ! मत रो, मत रो, आँसू क्यों मरुथल में बोती है ।
निज समाज की कुलीनता का भार तुझे ही ढोना है ।
विधवे ! धीरज धर तुझको तो अब जीवन भर रोना है।
विधवे ! धीरज धर तुझको तो अब जीवन भर रोना है।
एकाकिनी नहीं तू अब भी साथ निभाने को सत्वर ।
कदम-कदम पर चुभन मिलेगी कुढ़न मिलेगी जीवन भर ।"
कदम-कदम पर चुभन मिलेगी कुढ़न मिलेगी जीवन भर ।"
"शंका भरी दृष्टियाँ होंगी शिक्षाएँ अपमान भरी ।
वर्जन -तर्जन-सहित मिलेगी हमदर्दी अहसान भरी ।
वर्जन -तर्जन-सहित मिलेगी हमदर्दी अहसान भरी ।
विगत संस्मरण पाहुन होंगे
सिसकी सगी सखी होगी।
सूने जीवन- पथ में भी तू एकाकिनी नहीं होगी ।
सूने जीवन- पथ में भी तू एकाकिनी नहीं होगी ।
ताने - देवर घुटन – कुँआरी
ननद, रुदन
प्रिय भाई सा ।
आँखों में आवारा आँसू उस प्रियतम हरजाई सा ।
आँखों में आवारा आँसू उस प्रियतम हरजाई सा ।
सूखे चन्दन-विटप, क्रूर जग फिर
भी उसे जलाता है ।
रेशा - रेशा घिसे तभी निज मस्तक उसे लगाता है ।
रेशा - रेशा घिसे तभी निज मस्तक उसे लगाता है ।
विधि-निषेध-अहि-घिरी निभा तू मलय
- लता की परम्परा ।
छाती जग की शीतल कर, बन महाकाल की स्वयंवरा ।
छाती जग की शीतल कर, बन महाकाल की स्वयंवरा ।
उच्चवंश की यशोध्वजा तू
पीर - पवन में और फहर ।
आत्महवन का शुभारम्भ है विधवे ! रो मत जरा ठहर ।
आत्महवन का शुभारम्भ है विधवे ! रो मत जरा ठहर ।
विधवा-विधि-निषेध का जो भी
स्रष्टा प्रथम रहा होगा ।
कन्या -हीन कुलिश-उर निश्चय ही वह अधम रहा होगा ।
कन्या -हीन कुलिश-उर निश्चय ही वह अधम रहा होगा ।
चिता - दहन शुभ, मर्यादा की इस
ज्वाला में जलने से ।
मृत्यु भली, इन आदर्शों के हिम - शिखरों में गलने से ।
मृत्यु भली, इन आदर्शों के हिम - शिखरों में गलने से ।
नेह - रहित बाती सी विधवा
जल - जल कर सो जाती है।
रूढ़ि -ग्रस्त मानवता कितनी हृदय - हीन हो जाती है ।
रूढ़ि -ग्रस्त मानवता कितनी हृदय - हीन हो जाती है ।
मानवीय नैतिकताओं के सुविचारकों ! कहाँ हो तुम ।
जग - जीवन के न्यायालय के निर्णायकों कहाँ हो तुम ?
जग - जीवन के न्यायालय के निर्णायकों कहाँ हो तुम ?
बोलो निगमागम - पुराण के
ज्ञाताओं बोलो - बोलो ।
धर्म - कर्म - मर्मज्ञ ज्ञान की प्रतिमाओं ! बोलो - बोलो ।
धर्म - कर्म - मर्मज्ञ ज्ञान की प्रतिमाओं ! बोलो - बोलो ।
जहाँ नारियाँ पुजतीं रमते
हैं हरदम देवता वहाँ ।
विधवाओं के प्रति ये पावन भाव लुप्त हो गया कहाँ ।"
विधवाओं के प्रति ये पावन भाव लुप्त हो गया कहाँ ।"
"वे कलियाँ जिनके खिलने के पहले भँवरे रूठ गये ।
परिणय के बन्धन पहले ही प्रथम मिलन के टूट गये ।
परिणय के बन्धन पहले ही प्रथम मिलन के टूट गये ।
जिनका लुटा सुहाग लाज
के बोल फूटने के पहले ।
हल्दी - रंग रँगे हाथों के रंग छूटने के पहले ।
हल्दी - रंग रँगे हाथों के रंग छूटने के पहले ।
जिनके पैरों की मेंहदी
भी अब तक सूख न पाई हो ।
सज्जित परिणय के कंगन से ही रंगीन कलाई हो ।
सज्जित परिणय के कंगन से ही रंगीन कलाई हो ।
जो न भुला पाई हो बचपन नई - नई तरुणाई हो ।
अर्ध-निमीलित मदिर दृष्टि से प्रिय को देख न पाई हो ।
अर्ध-निमीलित मदिर दृष्टि से प्रिय को देख न पाई हो ।
कान कभी सुन सके न
जिसके मनभाई मनुहार कभी ।
बाहों में सोने के सपने हो न सके साकार कभी ।
बाहों में सोने के सपने हो न सके साकार कभी ।
अंग अपरिचित जिसके अब
तक मादक अंग - स्पर्शों से ।
क्या यह न्याय बाँधना उसको संयम के आदर्शों से ।
क्या यह न्याय बाँधना उसको संयम के आदर्शों से ।
सावन के कजरारे घन पर जब बिजलियाँ मचलती हैं ।
जब नीलाभ जलद के नीचे बक - पंक्तियाँ विहरती हैं।
जब नीलाभ जलद के नीचे बक - पंक्तियाँ विहरती हैं।
आँख मिचौली चाँद खेलता है जब तरल घटाओं से ।
क्या बीतती हृदय पर पूछो इन तरुणी विधवाओं से ।
क्या बीतती हृदय पर पूछो इन तरुणी विधवाओं से ।
बोले जब पी - कहाँ पी –कहाँ चातक शरद -निशाओं में ।
कोकिल की काकली तैरती फिरती सभी दिशाओं में ।
कोकिल की काकली तैरती फिरती सभी दिशाओं में ।
जब-जब उलझ-उलझ आँचल से बहता चंचल मदिर पवन ।
कभी सुनो कल्पना- कान से क्या कहता विधवा का मन।
कभी सुनो कल्पना- कान से क्या कहता विधवा का मन।
पुष्पवती लतिका उतावली जब रसाल खुद वर लेती।
छोड़ शील संकोच उसे निज भुज- पाशों में भर लेती ।
छोड़ शील संकोच उसे निज भुज- पाशों में भर लेती ।
जब नख-शिख-श्रृंगार
रचाती है कोई आगत - पतिका ।
हास - विलास भरी घर-आँगन डोले रूप धरे रति का ।
हास - विलास भरी घर-आँगन डोले रूप धरे रति का ।
वट-पूजन को जब सज-धज कर चले रमणियों की टोली
अथवा राग -रंग में डूबे खेलें नव - दम्पति होली ।
अथवा राग -रंग में डूबे खेलें नव - दम्पति होली ।
ऐसे में कैसे बेचारी विधवाएँ निस्ताप रहें ।
जीवन -भर निर्जीव शिला सी मौन जिएँ , आघात सहें ।
जीवन -भर निर्जीव शिला सी मौन जिएँ , आघात सहें ।
एक ओर वर्जन पर वर्जन विधवाओं के प्राणों पर ।
एक ओर हम रचते चौंसठ काम - कला पाषाणों पर ।
एक ओर हम रचते चौंसठ काम - कला पाषाणों पर ।
सीख मंदिरों की
प्राचीरें तक दें काम - कलाओं की।
विविध वर्जना-वज्राहत हा ! तकदीरें विधवाओं की ।
विविध वर्जना-वज्राहत हा ! तकदीरें विधवाओं की ।
उद्दीपन से घिरी जवानी कब तक संयम बरतेगी ।
जल में रहकर मछली जल की खातिर कब तक तरसेगी ।"
जल में रहकर मछली जल की खातिर कब तक तरसेगी ।"