तीन तलाक प्रथा असंवैधानिक


मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन-तलाक प्रथा से पीड़ित एक महिला (उत्तराखंड की शायरा बानो) सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। उसने भारतीय संविधान के तहत अपने अधिकार के संरक्षण की गुजारिश की। इससे सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह मुद्दा आया कि क्या एक ही झटके में तीन बार बोलकर तलाक देने की रवायत मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? साथ ही ये बहस भी चली कि क्या ये प्रथा इस्लाम का अनिवार्य अंग है? खुद मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा जनमत मानता है कि तीन तलाक जैसी प्रथाएं उनके मजहब का बुनियादी हिस्सा नहीं। इसीलिए कई इस्लामिक समाजों में इसका चलन रोका जा चुका है। मगर भारत में मुस्लिम समुदाय के भीतर से इसे बदलने की पहल नहीं हुई। अंतत: पीड़िताओं की उम्मीदें सुप्रीम कोर्ट पर जाकर टिकीं।
हर्ष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निराश नहीं किया।
हालांकि पांच सदस्यीय संविधान पीठ की राय बंटी रही, फिर भी बहुमत के निर्णय से तीन तलाक प्रथा असंवैधानिक ठहरा दी गई है। दो जज (जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित) इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ये चलन संविधान के मौलिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता एवं समान संरक्षण का अधिकार) और 15 (भेदभाव पर प्रतिबंध) के विरुद्ध है। जबकि ये मामला अनुच्छेद 25 (उपासना, अपने धर्म के पालन और प्रचार के मूल अधिकार) के तहत नहीं आता। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने इसे गैर-इस्लामी ठहराया। लेकिन दो जजों (जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर) की राय रही कि तीन तलाक भारत में इस्लाम एवं इस्लामिक पर्सनल लॉ का अभिन्न् अंग है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 (जीवन एवं स्वतंत्रता का हक) का उल्लंघन नहीं है। चूंकि तीन जजों की राय इस प्रथा के खिलाफ आई, अत: अब तीन तलाक पर अमल असंवैधानिक हो गया है। न्यायालय ने सरकार से कहा है कि इस फैसले पर अमल को सुनिश्चित करने के लिए वह उपयुक्त कानून बनाए। सरकार और सभी राजनीतिक दलों को प्रधान न्यायाधीश ने एक उचित सलाह दी है। कहा कि उन्हें अपने फायदे की सोच से उठकर उचित कानून बनाने पर गहराई से सोचना चाहिए। इस मामले में अब चूंकि संवैधानिक स्थिति स्पष्ट हो गई है, तो जाहिर है कि मामला संसद और सियासी दायरे में पहुंच गया है। वहां निर्णय का एकमात्र आधार मुस्लिम महिलाओं को मौजूदा मुसीबतों से निजात दिलाना और उनके लिए बराबरी सुनिश्चित करना होना चाहिए।
दरअसल, वांछित यही है कि पूरा समाज यही दृष्टिकोण अपनाए। आखिर इस मामले में सरकार या संसद के कदम भी तभी सार्थक होंगे, जब समाज इसके प्रति सकारात्मक नजरिया अपनाएगा। पंरपरागत रूप से स्त्रियां समानता से वंचित और कई प्रकार की कुरीतियों की शिकार रही हैं। तीन तलाक उनमें से सिर्फ एक कुप्रथा है। अब चूंकि लैंगिक न्याय की दिशा में न्यायापालिका ने अहम फैसला दिया है, तो यह सही वक्त है जब महिलाओं को सभी प्रकार के अधिकार दिलाने का संकल्प समाज ले।