क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विवादास्पद व्यक्तित्व


क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विवादास्पद व्यक्तित्व रहे हैं। जहाँ बहुत से लोग उन्हें महान क्रांतिकारी व देशभक्त मानते हैं वहीँ ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो उन्हें सांप्रदायिक मानते हैं और महात्मा गाँधी की हत्या से जोड़ कर देखते हैं। सत्य जो भी तथ्य ये है कि हिन्दू राष्ट्र और हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का श्रेय सावरकर को ही जाता है। 
नाम – विनायक दामोदर सावरकर
जन्म- 28 मई 1883 ,ग्राम भागुर, जिला नासिक बम्बई प्रान्त ब्रिटिश भारत
मृत्यु- फ़रवरी 26, 1966 (उम्र 82) बम्बई, भारत
शिक्षा- कला स्नातक, फर्ग्युसन कॉलिज, पुणे बार एट ला लन्दन
क्या थे- क्रान्तिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, चिन्तक, लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता
विनायक दामोदर सावरकर का जन्म मराठी चित्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम दामोदर और माता का नाम राधाबाई सावरकर था. उनका परिवार महाराष्ट्र के नाशिक शहर के पास भगुर ग्राम में रहता था. उनके और तीन भाई –बहन भी है, जिनमे से दो भाई गणेश और नारायण एवं एक बहन मैना है.

1901 में विनायक का विवाह यमुनाबाई से हुआ, जो रामचंद्र त्रिंबक चिपलूनकर की बेटी थी, और उन्होंने ही विनायक की यूनिवर्सिटी पढाई में सहायता की थी. बाद में 1902 में उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में एडमिशन लिया. एक युवा व्यक्ति के रूप में उन्हें नयी पीढ़ी के राजनेता जैसे बाल गंगाधर तिलकबिपिन चन्द्र पाल और लाला लाजपत राय से काफी प्रेरणा मिली जो उस समय बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी अभियान चला रहे थे. सावरकर बहोत से स्वतंत्रता अभियान में शामिल हुए थे. 1905 में दशहरा उत्सव के समय विनायक ने विदेशी वस्तुओ और कपड़ो का बहिष्कार करने की ठानी और उन्हें जलाया. इसी के साथ उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों और मित्रो के साथ मिलकर राजनैतिक दल अभिनव भारत की स्थापना की. बाद में विनायक के कामो को देखते हुए उन्हें कॉलेज से निकाला गया लेकिन अभी भी उन्हें बैचलर ऑफ़ आर्ट की डिग्री लेने की इज़ाज़त थी. और अपनी डिग्री की पढाई पूरी करने के बाद, राष्ट्रिय कार्यकर्त्ता श्यामजी कृष्णा वर्मा ने कानून की पढाई पूरी करने हेतु विनायक को इंग्लैंड भेजने में सहायता की, उन्होंने विनायक को शिष्यवृत्ति भी दिलवाई. उसी समय तिलक के नेतृत्व में गरम दल की भी स्थापना की गयी थी. तिलक भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के उग्रवादी नेता थे और साथ ही गरम दल के सदस्य भी थे. उनके द्वारा स्थापित किये गये दल का उद्देश्य भारत से ब्रिटिश राज को खत्म करना ही था.
वीर सावरकर का प्रारम्भिक जीवन व शिक्षा-दीक्षा

वीर सावरकर के दो भाई थे। जिनमे एक का नाम गणेश सावरकर और दूसरे का नाम नारायण सावरकर था। वह जब केवल नौ वर्ष के थे, तभी हैजे की महामारी के कारण उनकी माँ का देहांत हो गया। और उसके करीब सात वर्ष बाद, वर्ष 1899 में प्लेग महामारी के चलते उनके पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया। पिता की मृत्यु के बाद परिवार चलाने का कार्यभार बड़े भाई गणेश सावरकर ने संभाल लिया था।
1901 में वीर सावरकर का विवाह यमुनाबाई से हुआ। उनके दो पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्रों का नाम प्रभाकर, और विश्वास था जबकि पुत्री का नाम प्रभा चिपलूणकर था। यमुनाबाई के पिताजी ने वीर सावरकर की काफी आर्थिक मदद की और उनकी उच्च शिक्षा का खर्च भी वहन किया। वीर सावरकर की विश्वविद्यालय की पढ़ाई का भार उनके ससुर ने उठाया था। उन्होने फर्ग्यूसन कॉलेज से बी.ए (कला क्षेत्र) की उपाधि प्राप्त की थी। वर्ष 1909 में वीर सावरकर ने लंदन जा वकालत की डिग्री हासिल की।

मित्र मेला

1897 की गर्मियों में महाराष्ट्र में प्लेग फैला हुआ था, जिसपर अंग्रेजी हुकूमत ध्यान नहीं दे रही थी। इस बात से क्षुब्ध हो कर दामोदर चापेकर ने ब्रिटिश ऑफिसर W.C Rand को गोली मार दी, जिस कारण उन्हें मौत की सजा दे दी गयी। इस घटना के बाद सावरकर ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रन्तिकारी गतिविधियाँ बढाने के लिए मित्र मेला” का गठन किया।

अभिनव भारत संगठन

फर्ग्युसन कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने छात्रों को एकत्रित किया और स्वतंत्रता सेनानियों की फ़ौज खड़ी करने के लिए वर्ष 1904 में अभिनव भारत संगठन की स्थापना की। इस दौरान सावरकर ने क़ानून, इतिहास, और दर्शनशास्त्र से सम्बंधित कई किताबें पढ़ीं और व्यायामशालाओं में जाकर प्रशिक्षण भी लिया। इन्ही दिनों वे लोकमान्यतिलक से भारत की आज़ादी के लिए विचार-विमर्श भी किया करते थे।
वर्ष 1905 बंगाल के विभाजन के विरोध में उन्होने विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी। वर्षों बाद महात्मा गाँधी ने भी स्वदेशी आन्दोलन में ऐसा ही किया था। इस घटना से कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन नाराज हो गया और सावरकर को डिसमिस कर दिया गया। पर बाकी छात्रों के दबाव और तिलक की अनुरोध पर उन्हें एग्जाम देने दिया गया और वे अच्छे नम्बरों से पास हुए।

लन्दन प्रवास ( 1906-1910)

ग्रेजुएशन करने के बाद तिलक जी के अनुमोदन पर उन्हें श्यामजी कृष्णवर्मा द्वारा स्कालरशिप प्रदान की गयी और वे बार-ऐट-लॉ की पढ़ाई करने के लिए लन्दन रवाना हो गए। भारत में मौजूद ब्रिटिश अधिकारियों ने लन्दन में इनपर विशेष नज़र रखने की सूचना भेजी। लन्दन में वे इंडिया हाउस में रहने लगे। वहां उनकी मुलाकात लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा, आदि छात्रों से हुई। सावरकर ने सभी को अभिनव भारत से जोड़ दिया। अपने लन्दन प्रावास के दौरान ही वर्ष 1908 में वीर सावरकर ने एक किताब भी लिखी थी, जिसका नाम था- “फर्स्ट वॉर ऑफइंडिपेंडेंस”। हालांकि ब्रिटिश अधिकारीयों ने इसेजब्त कर लिया और किताब पब्लिश नहीं हो पायी। इन्ही दिनों सावरकर ने हर्बर्ट स्पेंसर, अगस्त कॉमटे, और माजिनी को पढ़ा ताकि वे अभिनव भारत का सिद्धांत गढ़ सकें।

विलियम हर्ट कर्जन वायली और जैक्सन की हत्या

सावरकर के अनुयायी व परम मित्रों में से एक मदन लाल ढींगरा ने 1 जुलाई, 1909 के दिन विलियम हर्ट कर्जन वायली की गोली मार कर हत्या कर दी। उस दिन कर्जन अपनी पत्नी के साथ इंडियन नेशनल एसोसिएशन द्वारा इम्पीरियल इंस्टिट्यूट में आयोजित एक समारोह में आया हुआ था और जब वो हॉल से निकल रहा था तभी ढींगरा ने उसपर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। गलती से कर्जन को बचाने के लिए बीच में आने वाले एक पारसी डॉक्टर को भी गोली लग गयी और उसकी भी मौत हो गयी।
विलियम हर्ट कर्जन वायली की हत्या के जुर्म में मदन लाल ढींगरा को 13 मार्च 1910 को फाँसी दे दी गयी। सावरकर ने इसका विरोध किया और ढींगरा को गलत मानने वाले एक भारतीय दल के खिलाफ भी आवाज़ उठाई। इस घटना के बाद सावरकर ब्रिटिश अधिकारीयों की नज़र में चढ़ गए थे, इसलिए वे फ़ौरन पेरिस चले गए जहाँ पहले से ही अंग्रजों द्वारा सताए गए उनके साथी हरदयाल और कृष्णावर्मा ने शरण ली हुई थी। जब सावरकर पेरिस में थे तभी अभिनव भारत के एक सदस्य अनंत कन्हारे ने जैक्सन नामक एक ब्रिटिश ऑफिसियल की हत्या कर दी। अंग्रेजों ने इन हत्याओं के पीछे सावरकर को दोषी माना और जब 13 मई, 1910 को वे ब्रिटेन आये तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

सावरकर की गिरफ्तारी और भागने का प्रयास

वीर सावरकर 13 मई, 1910 के दिन पेरिस से लंदन आये और आते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में बंद सावरकर ने जब सुना कि उन्हें जहाज द्वारा फ़्रांस के दुसरे सबसे बड़े शहर मार्सैय (Marseille) होते हुए भारत ले जाया जायेगा तो उन्होंने फ़ौरन फरार होने का एक प्लान बना लिया। उनका सोचना था कि फ़्रांस में शरण लेने से फ्रेंच सरकार उन्हें ब्रिटिश लॉ से बचा लेगी। जब उनका जहाज मार्सैय के तट पर पहुँचने वाला था तभी उन्होंने टॉयलेट जाने का बहाना किया और पोर्टहोल के स्क्रू खोल कर समुद्र में कूद गए और तैरते हुए तट के किनारे पहुँच गए। पर दुर्भाग्यवश फ्रेंच पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और पुनः अंग्रेजों के हवाले कर दिया।

50 साल की सजा

वीर सावरकर को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से ब्रिटिश सरकार ने एक नहीं दो-दो आजीवन कारावास यानि 50 साल की सजा दी थी। इस प्रकार की सजा एक ऐतिहासिक घटना थी। क्योंकि इससे पहेले कभी किसी व्यक्ति को दोहरे आजीवन कारावास की सज़ा नहीं सुनाई गयी थी। और सजा काटने के लिए जो जेल चुनी गयी थी वो थी अंडमान निकोबार आइलैंड की राजधानी में बनी हुई सेलुलर जेल। यह जेल काला पानी के नाम से कुख्यात थी। जब सावरकर को जेल में लाया गया तब पहले से ही उनके कुछ साथी वहां मौजूद थे, जिनमे उनके बड़े भाई गणेश भी शामिल थे।

जेल में मिली यातनाएं

सेलुलर जेल में रखे गए कैदीयों से खूब काम कराया जाता था। उन्हे भर पेट खाना भी नहीं दिया जाता था। नारियल छील कर उसका तेल निकालना, जंगलों से लकड़ियाँ काटना, तेल निकालने की चक्कियों में कोल्हू के बैल की तरह मजदूरी करना और पहाड़ी क्षेत्रों में दुर्गम जगहों पर हुकुम के मुताबिक काम करना, यह सब कठिन काम वीर सावरकर को सेलुलर जेल के अन्य कैदीयों के साथ करने पड़ते थे। इसके अलावा छोटी-छोटी गलतियों पर कैदियों की खूब पिटाई की जाती आर काल कोठरी में कई-कई दिन तक भूखे प्यासे रखा जाता था।

जेल से रिहाई

वीर सावरकर 4, जुलाई 1911 से ले कर 21 मई, 1921 तक पोर्टब्लेयर की सेलुलर जेल में रहे थे।  1920 में सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल ने सावरकर को रिहा किये जाने की बात उठाई जिसे गाँधी जी और नेहरु जी ने भी समर्थन दिया और परिणामस्वरूप सावरकर को पहले सेलुलर जेल से पुणे की येरवडा जेल और फिर वेस्टर्न महराष्ट्र की रत्नागिरी जेल में भेज दिया गया। रत्नागिरी जेल में रहते हुए ही वीर सावरकर ने हिंदुत्व पर अपने विचार लिखे जिसे उनके समर्थकों ने चोरी-छिपे प्रकशित व प्रचारित किया। इसके बाद 6 जनवरी 1924 को उन्हें जेल से इस शर्त के साथ रिहा कर दिया गया कि वे अगले 5 साल रत्नागिरी छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे और किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे।

रिहाई के बाद

रिहा होने के कुछ दिनों बाद सावरकर ने 23 जनवरी 1924 को रत्नागिरी हिन्दू सभा का गठन किया जिसका उद्देश्य भारत की प्राचीन सभ्यता को बचाना और सामजिक कार्य करना था। उन्होंने हिंदी भाषा को देश भर में आम भाषा के रूप में अपनाने पर जोर दिया और दिया और हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति भेद व छुआछूत को ख़त्म करने का आह्वान किया। इन सामजिक कार्यों को करने के साथ साथ वे पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित हिन्दू महासभा के सक्रीय सदस्य बन गए। 1937 में वीर सावरकर को हिन्दू महासभा का अध्यक्ष चुन लिया गया और वे 1943 तक इस पद पर बने रहे। उनकी अध्यक्षता में पार्टी ने हिन्दू राष्ट्र व अखंड भारत की विचारधारा को बढ़ावा दिया। महासभा ने पकिस्तान बनाए जाने का विरोध किया और महात्मा गाँधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया।

महात्मा गाँधी की हत्या

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की हत्या कर दी। गोडसे हिन्दू महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ का सदस्य था। माना जाता है कि गाँधी जी की हत्या से पहले गोडसे सावरकर से मिलने मुम्बई भी गया था। इन्ही आधार पर सावरकर को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया पर आरोप साबित ना हो पाने के कारण उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया। हालांकि, स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को अधिकांशत: स्वतंत्रता सेनानी व हिन्दुत्व के पुरोधा के तौर पर जाना जाता है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वे असाधारण समाजसेवी भी थे। अपने विचारों, शब्दों व कृत्यों के जरिये सामाजिक सुधारों के उनके प्रयासों को धार्मिक संकीर्णतावादियों और सरकार की ओर से बड़े विरोधों का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद, बेहद कम संसाधनों से उन्होंने अपने प्रयास जारी रखे।
सावरकर ने समाज सुधार व तार्किकता से जुड़े अपने विचारों को कलमबद्घ भी किया। रत्नागिरि में नजरबंदी के दौरान उन्होंने 'जातुच्छेदक निबंध' (जातिप्रथा उन्मूलन पर निबंध) व 'विज्ञान निष्ठा निबंध' (वैज्ञानिक सोच पर निबंध) लिखे थे। उनके लिखे नाटक 'उ:षाप' (श्राप का प्रतिकार) में अस्पृश्यता, महिलाओं के अपहरण, शुद्घि व रूढि़वादियों के दोगलेपन जैसे विषयों को उठाया गया है। उन्होंने मंदिर में दाखिल होने जैसे विशिष्ट अवसरों पर कविताएं भी लिखीं।
आजीवन समाजसेवी

अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि सावरकर ने समाजसेवा का अभियान निम्न जातियों के प्रति सहानुभूति के लिए नहीं बल्कि हिन्दू सशक्तीकरण के लिए चलाया था। पर उनका यह कथन इस आरोप को सिरे से खारिज करता है, ''हमारे 7 करोड धर्मावलंबियों को 'अस्पृश्य' व पशुओं से बदतर कहना न केवल मानवजाति का बल्कि हमारी आत्मा का भी अनादर करना है। इसीलिए मेरा अटूट विश्वास है कि अस्पृश्यता का समूल उन्मूलन होना चाहिए़.. जब मैं यह कह कर किसी का स्पर्श करने से इनकार करता हूं कि वह किसी विशेष जाति में पैदा हुआ है, परंतु कुत्तों व बिल्लियों के साथ खेलता हूं, उस समय मैं मानवता के विरुद्घ सबसे जघन्य अपराध करता हूं। अस्पृश्यता का उन्मूलन केवल इसलिए जरूरी नहीं कि यह हमारे ऊपर थोपी गई है बल्कि इसलिए भी कि धर्म के किसी भी पक्ष पर विचार करते हुए इसे न्यायसंगत ठहराना असंभव है। अत: इस प्रथा को धर्म के एक आदेशानुसार समाप्त किया जाना चाहिए।'' (1927, समग्र सावरकर वांग्मय, सं़ एस.आर.दाते, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदू सभा, पुणे, 1963-1965, खंड 3, पृ़ 483)
उनके विरुद्घ एक अन्य आक्षेप यह लगाया गया कि उन्होंने समाज सुधार कार्य केवल इसलिए शुरू किया क्योंकि उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर अंग्रेजी सरकार ने पाबंदी लगा दी थी और बिना शर्त रिहाई के बाद वे सामाजिक कायार्ें को भूल गए थे। 1920 में अंदमान से भेजे गए एक पत्र में उन्होंने लिखा, ''जैसा कि मेरा मानना है कि मैं हिन्दुस्तान पर विदेशी हुकूमत के खिलाफ बगावत करूं, इसी तरह मैं यह भी मानता हूं कि मुझे जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ भी बगावत करनी चाहिए।'' यह पत्र उन्होंने हिंदुओं को एकजुट करने के अपने निर्णय से पहले लिखा था। बतौर हिंदू महासभा अध्यक्ष उनकी कोई यात्रा अस्पृश्य रहे लोगों के घरों में जाए बिना पूरी नहीं होती थी। गणेशोत्सव के अवसर पर वह एक ही शर्त पर व्याख्यान देते थे कि उस अवसर वे अस्पृश्य रहे लोग भी मौजूद रहें।
मील का पत्थर
हालांकि सावरकर जीवनभर समाजसुधार के कायार्ें में लगे रहे, परंतु 1924 से 1937 के समय को उनके समाजसेवी जीवन का शीर्ष माना जा सकता है। महाराष्ट्र का तटवर्ती रत्नागिरि जिला पुरातनपंथियों का गढ़ था। हिंदू समाज का सामाजिक ताना-बाना सात जातिगत बेडि़यों में बंधा था। 1925 में सावरकर ने महार समुदाय (आंबेडकर इसी जाति से थे) से अपने सर्वेक्षण की शुरुआत की। उन्होंने सामूहिक भजन गान आयोजित करना शुरू किया। उन्होंने व्यवस्था की कि महार, कुम्हार व वाल्मीकि जैसी निचली जातियों के बच्चे प्रतिदिन स्कूल जाएं। इसके लिए वे उनके अभिभावकों को चाक-स्लेट के साथ-साथ पैसे भी देते थे। 
विद्यालयों में जातिगत भेदभाव को सामने लाते हुए सावरकर ने रत्नागिरि हिंदू सभा की ओर से 1932 में आईसीएस अधिकारी लेमिंग्टन के सामने एक प्रस्तुति दी। लेमिंग्टन को 'निम्न' जातियों की देख-रेख का जिम्मा सौंपा गया था। सावरकर लिखते हैं, ''एक साथ शिक्षित होने के बाद, बच्चे बाद के जीवन में जातिगत भेदभाव को नहीं मानेंगे। वह जाति के आधार पर बंटवारा नहीं चाहेंगे। इसलिए 1923 के सरकारी नियम का सख्ती से पालन करना होगा। साथ ही, सरकार को 'निम्न जाति के बच्चों का विशेष स्कूल' जैसे शीर्षकों को भी समाप्त करना होगा। इस शीर्षक से ही स्कूल जा रहे बच्चों में हीनभावना घर करती है।'' (बालाराव सावरकर, पृ़ 159)
अस्पृश्यता विद्यालयों से ही नहीं, घरों से भी दूर हो, इसके लिए सावरकर अनेकानेक घरों में गए। वहां उनके साथ भिन्न जातियों के लोग होते थे। वे दशहरा व मकर संक्रांति के अवसरों पर ये यात्राएं करते थे। हिंदू महिलाओं की सभाओं में सावरकर ऐसी व्यवस्था करते कि पहले अस्पृश्य रहीं  महिलाएं 'ऊंची' जाति की महिलाओं को कुमकुम लगाएं। सावरकर ने पहले अस्पृश्यों में गिनी जाने वाली महिलाओं की एक संगीत मंडली भी बनाई और उन्हें वे आर्थिक सहायता भी देते थे। इस कार्य के लिए उन्होंने बैंक से ऋण भी लिया था। 1 मई, 1933 को उन्होंने एक कैफे की शुरुआत की जो अन्य जातियों के साथ 'अस्पृश्यों' के लिए भी था। यह समूचे भारत का पहला अखिल-हिंदूकैफे था। उन्होंने चाय, पानी आदि बांटने के लिए महार जाति के एक व्यक्ति को रखा था। सावरकर से मिलने आने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए उस कैफे में जाकर पहले चाय पीना अनिवार्य था। उन दिनों ऐसी छोटी-सी शुरुआत बहुत साहस का काम थी।
1920 के दशक में सभी जातियों के लोगों का साथ बैठकर खाना असंभव होता था। परंतु सावरकर ने किसी की परवाह किए बिना इसकी शुरुआत की थी। उनके समाज सुधार कायार्ें में सभी जातियों की भूमिका थी। उस समय ब्राह्मण मराठों के साथ बैठकर खाना नहीं खाते थे, मराठे, महारों व कुम्हारों के साथ भोजन नहीं करते थे; महार व कुम्हार सफाईकर्मी वर्ग के साथ खाने पर नहीं बैठते थे। कभी-कभार महार वर्ग के लोग सावरकर को उनके साथ बैठकर भोजन करने की चुनौती देते थे। सावरकर इसे खुशी-खुशी मान लेते और उसी समय किसी और निम्न जाति के व्यक्ति को पीने के लिए पानी लाने को कहते।
सावरकर ने उन लोगों के लिए शुद्घि (शुद्घिकरण या धर्मपरिवर्तन) की भी शुरुआत की जिन्होंने किसी धमकी या प्रलोभन के चलते हिंदू धर्म छोड़ा था। 22 फरवरी, 1933 को उत्सव रूप में उन्होंने अस्पृश्यता का पुतला भी फूंका था। अस्पृश्यता के खिलाफ महाड व नासिक में डॉ़आंबेडकर के अभियानों का उन्होंने समर्थन किया था।
पतितपावन मंदिर

सावरकर एक ऐसा मंदिर स्थापित करना चाहते थे जो सभी हिंदुओं के लिए हो। इस क्रांतिकारी अभियान हेतु उन्हें भागोजी सेठ कीर, डॉ़ महादेव गणपत शिंदे, काशीनाथ लक्ष्मण पारुलेकर एवं अन्य ईमानदार सहयोगी भी मिले। 10 मार्च, 1929 को महाशिवरात्रि के दिन, शंकराचार्य डॉ. कुर्तकोटि ने इस मंदिर की आधारशिला रखी थी। स्नान के बाद कोई भी हिंदू यहां पूजा कर सकता था। मंदिर के पुजारी का ब्राह्मण होना अनिवार्य नहीं था। मंदिर के न्यास में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व अस्पृश्य समुदायों व कीर जाति का एक नुमाइंदा था। सावरकर का विश्वास था कि समूचा हिंदू समाज विदेशी दमन के आगे झुका है। इसलिए उन्होंने इस मंदिर को 'पतितपावन मंदिर' का नाम दिया था। मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर पुणे के राजभोज के कुम्हार समुदाय के नेता ने शंकराचार्य डॉ. कुर्तकोटि के पैरों को अपने हाथों से धोया था। उस समय तक अस्पृश्यों को शंकराचार्य को सीधे प्रणाम करने का अधिकार नहीं था। अत: इस तथ्य में हैरानी नहीं कि समाजसेवा में सावरकर के अथक प्रयासों को उनके राजनीतिक विरोधियों ने भी सराहा। ब्रह्म समाज के नेता व दमित वर्ग मंडल प्रमुख विट्ठल रामजी शिंदे भी फरवरी 1933 में रत्नागिरि आए थे। वहां सावरकर के कायार्ें को देखकर उनके शब्द थे, ''मैं सावरकर की उपलब्धियों को देखकर अभिभूूत हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मेरा बचा हुआ जीवन भी वह सावरकर को दे दे ताकि वह मेरी आकांक्षाओं व अभिलाषाओं को पूरा कर सकें।'' इसलिए उनकी याद में हम उनके आदशार्ें का अनुसरण कर सकते हैं जिनके लिए उन्होंने अपने घर-परिवार को भी भुला दिया था!http://www.devjiblog.com/post/क्रांतिकारी-विनायक-दामोदर-सावरकर-:-भारतीय-स्वतंत्रता-संग्राम-के-विवादास्पद-व्यक्तित्व/
devjiblog ऐसे महान क्रन्तिकारी विनायक दामोदर सावरकर को प्रणाम करता है व् उनके हिंदुत्व विचारधारा का सम्मान करता है जिसमे न सभी भारतीय जातियों में न बटकर केवल हिंदुत्व में फले व फुले| जय हिन्दुत्व, जय सावरकर