भारत में आधिकारिक रूप से सर्वप्रथम 28 दिसंबर 1885 को ए ओ ह्यूम ने राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी की स्थापना की,जिसका मुख्य उद्देश्य था
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भारत
में राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करना।
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देश
में राजनीतिक चेतना का विकास करना।
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देश
में धर्म,जाति,
भाषा और प्रान्त के आधार पे बँटे
हुए लोगों को एकजुट करना।
·
देश
के विभिन्न भागों में फैले राष्ट्रवादी ताकतों को एक करना।
शुरुआत में इस राजनीतिक दल ने ये प्रयास किया कि वो ब्रिटेन के
उदारवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखनेवाले लोगों को अपने भरोसे में
लेकर भारतीयों को अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक और मौलिक अधिकार दिलाया जाए।
जबकि कई लोगों का यह भी मानना है कि काँग्रेस की स्थापना दरअसल एक “सेफ्टी वाल्व” था जिसका प्रमुख लक्ष्य था भारत
में ब्रिटिश सरकार की सत्ता पर आसन्न खतरों से उसे बचाना। 1961 में “यंग इंडिया” में प्रकशित
एक लेख में “लाला लाजपत राय” ने कहा था
कि “काँग्रेस की स्थापना डॉर्फिन
की दिमाग की उपज हैै जिसका उद्देश्यद्श्आज़ादी हासिल करने से कहीं ज्यादा यह थी कि
उस समय ब्रिटिश साम्राज्य पर आसन्न खतरों से उसे बचाया जा सके।” इसके अलावा सी एफ एंड्रयूज़ और मुखर्जी ने भी 1938
में प्रकाशित”भारत में काँग्रेस का उदय और
विकास” में सुरक्षा वाल्ब की बात पर सहमति जताई थी।
धीरे धीरे इस पार्टी की की लोकप्रियता बढ़ती गयी और पार्टी में
सदस्यों की संख्या बढ़ने से लोगों की विचारधारा में भी बदलाव हुए। और अब पार्टी ने
अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक और मौलिक अधिकार की जगह पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति को
अपना प्रमुख लक्ष्य बना लिया। लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पार्टी दो भागों
में बँटती नज़र आई।
नरम दल और गरम दल
हालाँकि दोनों दलों का लक्ष्य लगभग एक ही था लेकिन बाल गंगाधर तिलक
का मानना था कि अंग्रेजों के साथ मिलकर सरकार बनाना देश के लाखों लोगों के साथ
धोखा देना है। वो इसके सख्त खिलाफ़ थे।
जबकि मोतीलाल नेहरू हर चीज़ में अंग्रेजों को साथ लेकर ही चलना
चाहते थे। वे हमेशा उनकी बैठकों में शामिल होते थे और बहुत हद तक उनके अनुसार ही
अपनी रणनीति बनाते थे। इस तरह पार्टी दो खेमों में बँटते नज़र आए। जो खेमा बाल
गंगाधर तिलक का समर्थक था वो गरम दल कहलाया और जो मोतीलाल नेहरू का समर्थक था वो
नरम दल कहलाया।
संभवतः यहीं से भारतीय राजनीति में एक विपक्ष का जन्म हुआ। गरम दल
क्रांति का समर्थक था जबकि नरम दल स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकारों का।
संभवतः यहीं से भारतीय राजनीति के स्तर के गिरने की शुरुवात भी
हुई। आज़ादी के आते आते कई सारे वाकये सामने आए जिससे पता चलता है कि भारतीय
राजनीति के स्तर में गिरावट की शुरूवात हो चुकी थी।
चूँकि नरम दल के लोग अंग्रेजों के काफ़ी करीबी थे इसलिए आज़ादी के
आंदोलनों में उनके लगभग किसी भी बड़े राजनीतिक चेहरे को उम्रकैद या मृत्युदंड की
सज़ा नहीं हुई।
जबकि गरम दल वाले क्रांतिकारी विचारवाले थे। भारत को स्वतंत्रता की
लड़ाई में सबसे ज्यादा बड़े राजनीतिक चेहरे की मौत इन्हीं के गुट की हुई।
लाला लाजपत राय भीषण लाठीचार्ज के शिकार हुए,भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सज़ा हुई,चंद्रशेखर आज़ाद उच्च स्तर के राजनीतिक मुखबिरी के शिकार हुए,सावरकर जैसे कई नेताओं को अमानवीय कालापानी की सज़ा हुई। जबकि नरम दल के
नेताओं के ज्यादा से ज्यादा जेल जाना पड़ा।
इसके अलावा जब मुस्लिम लीग ने 1946 में
मस्लिमों के लिए अलग देश पाकिस्तान की माँग करते हुए
प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के रूप में बंगाल में साम्प्रदायिक हिंसा फैलाई तो उससे
तत्कालीन अंतरिम सरकार झुकने को बाध्य हो गयी और गाँधीजी ने बँटवारे के लिए हामी
भर दी। और भारत तीन हिस्सों में विभाजित हो गया।
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भारत
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पूर्वी
पाकिस्तान
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और
पश्चिमी पाकिस्तान
लेकिन इसके बावजूद भी साम्प्रदायिक हिंसा नहीं थमी और ये पूरे
उत्तर भारत में फैल गई जिसमें लाखों निर्दोष नागरिक मारे गए जिनमें बच्चे,बूढ़े और महिलाएँ शामिल थीं। हज़ारों महिलाओं के साथ बलात्कार हुए कइयों ने
आत्महत्या कर ली। ये सारी राजनीतिक विफलताएँ थीं जिन्हें तत्कलीन अंतरिम सरकार
सँभाल नहीं पाई।
आज़ादी के बाद भी क्रांतिकारी विचारधारा के लोगों को सरकार में
समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला और सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे हुतात्मा को भी नेहरू
के प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा के आगे झुकना पड़ा,जबकि ये सभी जानते थे कि सरदार पटेल एक प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू से
कहीं ज्यादा योग्य थे। खंडित भारत का एकीकरण का श्रेय भी सरदार पटेल को ही जाता
है। जबकि नेहरू के दामन में चीन द्वारा भारतीय भूमि को कब्जाने और कश्मीर समस्या
का दाग है।
नेहरू ने ही कृष्ण मेनन को रक्षामंत्री बनाया जो उस वक्त नेहरू के
बहुत करीबी थे। उनका कार्यकाल बहुत ही विवादित रहा और सेना के तीनों अंगों के
सेनाध्यक्ष उनसे रूष्ट थे। उन्होंने भारत की सैन्य तैयारियों को पूरी तरह से
नज़रअंदाज़ कर दिया जिसका खामियाजा हमें भारत के एक बड़े भूभाग को गँवाकर और हज़ारों
सैनिकों की जान से चुकानी पड़ी। आज़ भी चीन अरुणाचल
प्रदेश पर अपना दावा करता है। कश्मीर समस्या भी नेहरू की इसी अदूरदर्शिता नतीजा है
क्योंकि सरदार पटेल के लाख मना करने के बाद भी वो इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र ले
गए जिसके फलस्वरूप कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा आज़ भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है और पूरा देश आज़ तक पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेल रहा है।
इसके अलावा लाल बहादुर शास्त्री की भी ताशकंद में हुए संदिग्ध मौत
के कारण का खुलासा करने के लिए केंद्र सरकार हमेशा आनाकानी करती रही है।
इंदिरा गाँधी भी अपने तानाशाही रवैये और महज़ अपने स्वार्थ के लिए
आपातकाल लागू करने के वजह से काफ़ी बदनाम रही।
ये तो हुई सत्ता की बात…
अब आते हैं घोटाले,तुष्टिकरण,घुसपैठ समस्या,अभद्र राजनीतिक टिप्पणी और राजनीति
में आपराधिक तत्वों के प्रवेश के मुद्दे पे जिसके कारण भारतीय राजनीति के गिरते
स्तर का पता चलता है। आइये इसपर हम सिलसिलेवार चर्चा करते हैं।
घोटाले
भारत की सरकार और घोटालों का चोली दामन का साथ लगता है। चाहे देश
में कोई भी सरकार रही हो वो घोटाले के दंश से नहीं बच सके। इससे जनता में सरकार के
खिलाफ़ एक ओर जहाँ विश्वास कम हुआ…वहीं लोकतंत्र के
प्रति आस्था में भी कमी आयी।
आइये एक नज़र डालते हैं देश के बड़े घोटालों पर।
जीप घोटाला:-
आज़ादी के बाद भारत सरकार ने 80 लाख
रुपए में 2000 जीपों का सौदा किया जिसमें भारत को केवल 155
जीपें ही मिल पाई। इस घोटाले में कथित रूप से भारत के तत्कालीन
उच्चायुक्त वी के कृष्ण मेनन का नाम सामने आया लेकिन नेहरू के करीबी होने के कारण
यह फ़ाइल जल्द ही बन्द हो गयी।
बोफोर्स घोटाला:
यह बहुत चर्चित घोटाला है करोड़ों के इस घोटाले में प्रधानमंत्री
राजीव गाँधी समेत कई बड़े चेहरों की तथाकथित संलिप्तता की बात आई। इसमें 22
जनवरी 1990 को मामला दर्ज हुआ लेकिन आज़तक
इसमें कोई भी गिरफ्तारी नहीं हुई जबकि घोटाले का कोई भी पैसा वसूल भी नहीं हो पाया
है।
एच डी डब्ल्यू सबमरीन घोटाला:-
इस सौदे के तहत जर्मनी से 465 करोड़
रुपए में चार पनडुब्बी का सौदा हुआ लेकिन 1987 तक केवल दो
पनडुब्बी ही भारत को मिल पाई जबकि इस सौदे में कथित रूप से रक्षा सौदे से जुड़े
लोगों द्वारा 32 करोड़ रुपए के कथित कमीशनबाजी की बात उजागर
हुई।
स्टॉक मार्केट घोटाला:-
हज़ारों करोड़ के इस चर्चित घोटाले में हर्षद मेहता समेत चार लोगों को सज़ा
हुई जिसमें सरकार ने निवेशकों को भरपाई के रूप में 6625 करोड़
रुपए चुकाए जिसका भारी बोझ देश के ईमानदार करदाताओं को चुकाना पड़ा।
दूरसंचार घोटाला:-
हज़ारों करोड़ के इस घोटाले में कथित रूप से तत्कालीन दूर संचार
मंत्री सुखराम का नाम आया और छापे के दौरान उनसे 5.36 करोड़
रुपए नकद बरामद हुए जिसे जब्त कर लिया गया।
यूरिया घोटाला:-
इस घोटाले में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के करीबी नेशनल
फर्टिलाइजर के प्रबंध निदेशक ने यूरिया आयात के लिए पैसे दिए जिसे अबतक वसूल नहीं
किया जा सका है।
कॉमनवेल्थ घोटाला:-
इस घोटाले में भी तथाकथित रूप से सुरेश कलमाडी का नाम सामने आया
लेकिन अब तक इस करोड़ों के घोटाले में एक भी पैसा सरकार वसूल नहीं कर पाई है।
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जी स्पेक्ट्रम घोटाला:-
लगभग पौने दो लाख करोड़ के इस घोटाले में तथाकथित रूप से ए राजा का
नाम सामने आया। जिसमें दूरसंचार मंत्री रहते हुए ए राजा ने बहुत ही सस्ती कीमतों
पे ऐसी कंपनियों को भी 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस दे दिए
जिन्हें दूर संचार का कोई अनुभव ही नहीं था या बहुत ही कम अनुभव था।
कोयला घोटाला:-
इस चर्चित घोटाले में सरकार को लगभग 1
लाख 86 हज़ार करोड़ के राजस्व के नुकसान का
अंदेशा है जिसमें CAG ने कोयला ब्लॉक की नीलामी में भारी
अनियमितता की बात उजागर की।
ऑगस्टा वेस्टलैंड घोटाला:-
इस घोटाले ने इस बात को उजागर किया कि किस तरह से देश के शीर्ष
राजनेता और रक्षा अधिकारी दलाली करते हैं। इस घोटाले में 610
मिलियन अमेरिकी डॉलर के 12 हेलीकॉप्टर की
आपूर्ति का अनुबंध पाने के लिए तथाकथित रूप से करोड़ों की रिश्वत दी थी। इस मामले
में तत्कालीन एयर चीफ मार्शल एस पी त्यागी से भी कई बार पूछताछ हो चुकी है।
टाट्रा ट्रक घोटाला:-
इस मामले में सेना के उपयोग के लिए 1676 ट्रकों
के खरीद के मामले में भी कथित रूप से 14 करोड़ रुपए की
रिश्वत देने की बात उजागर हो चुकी है।
आदर्श सोसाइटी घोटाला:-
इस घोटाले में तथाकथित रूप से महाराष्ट के तीन पूर्व
मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आरोप लगाए गए थे। इस
घोटाले में कथित रूप से मुम्बई के कोलाबा सोसाइटी में 31 मंजिला
इमारत के फ्लैटों को बाजार कीमत से बहुत कम दाम में बेच दिया गया जबकि ये रक्षा
विभाग की ज़मीन थी जिसे सोसाइटी के लिए दी गयी थी जो रक्षा विभाग के शहीदों के
आश्रितों और रक्षा स जुड़े लोगों के लिए थी।
ताबूत घोटाला:-
इस मामले में NDA का दामन भी
अछूता नहीं है। कारगिल युद्ध के दौरान हुए इस घोटाले में कथित रूप से तत्कालीन
रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस का नाम सामने आता रहा है।
इसके अलावा भी एल आई सी घोटाला,तेलगी
स्टाम्प घोटाला,मधु कोड़ा घोटाला,बॉम्बे
स्टॉक एक्सचेंज घोटाला,चारा घोटाला,नेशनल
हेराल्ड घोटाला समेत अनेक मामले हैं, जैसे :-
1987 – बोफोर्स तोप घोटाला, 960 करोड़
1994 – चीनी घोटाला, 650 करोड़
1995 – प्रेफ्रेंशल अलॉटमेंट घोटाला,
5,000 करोड़
1995 – कॉबलर घोटाला, 1,000 करोड़
1995 – दीनार / हवाला घोटाला, 400 करोड़
1996 – उर्वरक आयत घोटाला, 1,300 करोड़
1996 – चारा घोटाला, 950 करोड़
1996 – यूरिया घोटाला, 133 करोड
1997 – बिहार भूमि घोटाला, 400 करोड़
1997 – म्यूच्यूअल फण्ड घोटाला, 1,200
करोड़
1997 – सुखराम टेलिकॉम घोटाला, 1,500 करोड़
1998 – उदय गोयल कृषि उपज घोटाला, 210
करोड़
1998 – टीक पौध घोटाला, 8,000 करोड़
2001 – डालमिया शेयर घोटाला, 595 करोड़
2001 – केतन पारिख प्रतिभूति घोटाला,
1,000 करोड़
2002 – संजय अग्रवाल गृह निवेश घोटाला,
600 करोड़
2002 – कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज घोटाला,
120 करोड़
2003 – स्टाम्प घोटाला, 20,000 करोड़
2005 – बिहार बाढ़ आपदा घोटाला, 17 करोड़
2005 – सौरपियन पनडुब्बी घोटाला,
18,978 करोड़
2006 – ताज कॉरिडोर घोटाला, 175 करोड़
2006 – पंजाब सिटी सेंटर घोटाला,
1,500 करोड़
2008 – काला धन, 2,10,000 करोड
2008 – सत्यम घोटाला, 8,000 करोड
2008 – स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, 95 करोड़
2008 – हसन् अली हवाला घोटाला, 39,120
करोड़
2009 – चावल निर्यात घोटाला, 2,500 करोड़
2009 – झारखण्ड खदान घोटाला, 4,000करोड़
2009 – झारखण्ड मेडिकल उपकरण घोटाला,
130 करोड़
2010 – आदर्श घर घोटाला, 900 करोड़
2010 – खाद्यान घोटाला, 35,000 करोड़
2010 S – बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला,
2,00,000 करोड़
2011 – 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला,
1,76,000 करोड़
2011 – कॉमन वेल्थ घोटाला, 70,000 करोड़ , 48000 करोड़ का थोरियम घोटाला.
2011- पीएनबी बैंक लोन घोटाला 11330 करोड़ (जिसे मोदी सरकार ने 2018 में पकड़ा)
तुष्टिकरण,आरक्षण और अवैध
घुसपैठ
इस मामले में भी भारत की सरकारें बहुत बदनाम रहीं हैं…
और इससे भारतीय राजनीति का स्तर गिरा है। चाहे मुश्लिम तुष्टिकरण का
मामला हो या आरक्षण का मामला…सरकार ने सस्ती लोकप्रियता आर
एक वर्ग विशेष का वोट पाने के लिए इनका भरपूर सहारा लिया।
काँग्रेस और समाजवादी पार्टी और तृणमूल ने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के
ज़रिए खूब चांदी काटा जबकि भाजपा ने राम मंदिर के मुद्दे पर
हिंदुओं की सहानुभूति बटोरी और सत्ता तक भी पहुँचे। जबकि लोजपा और
बसपा आरक्षण और दलितों के नाम पर हमेशा सत्ता के गलियारे में बने रहे। जबकि
पृथकतावादी मजदूरों की राजनिति करके वामदल हमेशा काँग्रेस की कृपापात्र बनी
रही।जबकि राजद जातिवादी राजनीति से लगभग एक दशक तक राज्य की सत्ता में बनी रही। आज़
भी देश में विकास,शिक्षा,और रोज़गार की
जगह धर्म,आरक्षण,तुष्टीकरण,और जातिवाद जैसे मुद्दे ही चुनावों में मुख्य रूप से हावी रहते हैं।
भारत में अवैध घुसपैठ भी भारतीय राजनीति के गिरते स्तर को उजागर
करता है। इस घुसपैठ में कथित रूप से बंगाल का नाम सबसे ज्यादा आता है जहाँ लंबे
समय तक वामदलों का शासन था। बंगाल आर तमाम उत्तर पूर्वी राज्यों में घुसपैठ की
समस्या अब विकराल रूप ले चुकी है। और ये सब हुआ राजनीतिक दल के लोगों के मिलीभगत
के कारण।
राजनीतिक अपराधीकरण और बाहुबली:-
भारतीय राजनीति में ऐसी कोई भी दल नहीं है जिसमें आपराधिक
पृष्ठभूमि के लोग न हों। शाहबुद्दीन,मुख्तार
अंसारी,राजा भैया,अतीक अहमद,अरुण गवली जैसे हज़ारों नेता हैं जिनके ऊपर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
लेकिन सत्ता की चाह में सभी राजनीतिक पार्टियाँ इन्हें अपने पक्ष में करने में लगी
रहती हैं। यहा मै आपको ये भी बताना चाहूँगा के देश के 2019 के चुनाव मे प्रधानमंत्री के पद के दावेदारों मे एक काँग्रेस के राहुल गांधी जी नेशनल हेराल्ड केस मे स्वयं जमानत पर है और आजकल मौजूदा सरकार को घोटालो पर काफी ज्ञान दे रहे है, लालू यादव जी जेल मे है और भ्राष्ट्रचर के मामलो पर बहुत मुखर वक्तव्य दे रहे है, ममता बनर्जी की आधी पार्टी शारदा चिट्फूंद घोटालो मे व अवैध हथियार के केसो मे आरोपित है किन्तु प्रधानमंत्री की दौड़ मे वे भी शामिल है और ये सभी आपको अपराधमुक्त वातावरण दे सकेगे, आप ही बताइये?
नेताओं द्वारा अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल
भारतीय राजनीति के गिरते स्तर एक और प्रमाण मिलता है नेताओं के
अमर्यादित बयानबाजियों से। खासकर जब से सोशल मीडिया ज्यादा लोकप्रिय हुई है नेताओं
की भाषा भी उतनी ही तेज़ी से अमर्यादित,अभद्र,विवादास्पद और असंवैधानिक होती जा रही है। इस मामले में दिग्विजय सिंह,फारुख अब्दुल्ला,साक्षी महाराज,गिरिराज सिंह,ममता बनर्जी,सुब्रमण्यम
स्वामी,लालू यादव,मुलायम सिंह,आजम खान,अकबरुद्दीन ओवैसी और सीताराम येचुरी जैसे
लोग प्रमुख रूप से शामिल हैं….जो अक्सर ही विवादास्पद
बयानबाज़ी के चलते सुर्खियों में बने रहते हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि इन लोगो ने देश
के सबसे बड़े संवैधानिक पद “प्रधानमंत्री” पद की गरिमा को भी तार-तार कर दिये है जैसे
मणिशंकर अय्यर, लालू, अकबरुद्दीन ओवैसी, और राहुल गांधी जैसे राजनीति के दिग्गजों ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे मे
जिस प्रकार टिप्पणी कि है उसके बारे मे अब क्या कहे|
नेताओं का चारित्रिक पतन
आपराधिक पृष्ठभूमि से आनेवाले नेताओं और अन्य कई भ्र्ष्ट नेता
चारित्रिक रूप से अत्यंत ही पतित हैं। इससे भी राजनीति के गिरते स्तर का पता चलता
है। अक्सर ही न्यूज़ चैनल्स में इन नेताओं के द्वारा किये जा रहे यौन शोषण,भ्रष्टाचार,घूसकांड और मारपीट जैसी बातों का किसी
स्टिंग आपरेशन या प्रत्यक्ष रूप से प्रसारण होता रहता है।
तो ये सब थे प्रमुख कारण जिसके बीज दशकों पहले ही बोए गए थे जिससे
भारत की राजनीतिक स्तर का दिनोंदिन ह्रास हुआ और ये सिलसिला आज़ तक जारी है।
आरोप प्रत्यारोप की राजनीति
आरोप प्रत्यारोप की राजनीति ने भी देश की राजनीतिक स्तर को धूमिल
किया है। अक्सर ये देखा जाता है कि राजनीतिक दल अपनी कमियों को छुपाने के लिए एक
दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते हैं जिससे मुख्य मुद्दा पीछे छूट जाता है और
व्यर्थ के वाद विवाद होते रहते हैं। जबकि इसके उलट पार्टियों को चाहिए कि विपक्ष
हमेशा सत्तापक्ष को उनके ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग बनाए रखे और सत्ता पक्ष अपनी
कर्तव्यपरायणता का परिचय दे। लेकिन ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है। मौजूदा दौर मे
दिल्ली के मुख्य-मंत्री श्री अरविंद केजरीवाल का माफीनामा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है
|
विपक्ष द्वारा सरकार के हर कामों में अनावश्यक बाधा डालना
अब तो ऐसी परंपरा ही चल पड़ी है कि विपक्ष सत्तापक्ष के हर कार्यों
में ब्यवधान डालने की कोशिश करता है और उसकी आलोचना करता है। संसद,राज्यसभा,विधानसभा हर जगह विपक्ष अनावश्यक विवाद
पैदा करने की कोशिश करता है ताकि सरकार के कामों में व्यवधान पैदा हो। अक्सर ही हम
सब ने संसद,राज्यसभा और विधानसभा में विपक्ष द्वारा हंगामें
की तश्वीरों को देखते हैं। कई बार तो हाथापाई तक कि नौबत आ जाती है और
सुरक्षाकर्मियों तक को हस्तक्षेप करना पड़ जाता है। लोकतंत्र के मंदिर में ऐसा होना
निश्चित ही भारतीय राजनीति के गिरते हुए स्तर को उजागर करता है। 2014 से जब से मोदी
सरकार सत्ता मे आई है तब से विपक्ष (काँग्रेस, तृणमूल काँग्रेस, वांमदल) रोज ही हंगामे कर के देश को जिस प्रकार से नुकसान पहुंचा रहे है उसके
बारे मे आप का क्या विचार है? दल बदल की राजनीति
कई बार ऐसा देखा जाता है कि राजनीतिक पार्टियाँ हमेशा सत्ता से निकटता
बनाए रखने के लिए मर्यादाओं,विचारधारा और जनता
की भवन को ताक पर रखकर दल बदल करते रहते हैं। दरअसल इन्हें जनता से कोई सरोकार
नहीं होता और ये हमेशा सत्ता सुख को ही प्राथमिकता देते हैं। इसमें सत्ता बनाने के
लिए एक बहुत बड़े धन की मात्रा या फिर किसी अच्छे मंत्री पद के बदले खरीद फरोख्त
होती है। इससे भी भारत के राजनीतिक स्तर का पतन हुआ है, जैसे
नवजोत सिंह सिद्धू का काँग्रेस मे जाना, नरेश अग्रवाल का बीजेपी
मे जाना, और सबसे बड़ी देश कि जनता से धोखा, मायावती का सपा को समर्थन देना| ऐसा नहीं है कि
इसके ख़िलाफ़ कोई कानून नहीं है…लेकिन हमाम में सब नंगे हैं तो
कौन आवाज़ उठाएगा? क्या आप?

चुनावों में विभिन्न तरह का प्रलोभन देना और चुनावी गड़बड़ियाँ करना

चुनावों में विभिन्न तरह का प्रलोभन देना और चुनावी गड़बड़ियाँ करना
भारत में चुनावों के दौरान अमूमन हर पार्टियाँ ऐसा करने का प्रयास
करती हैं। वो मतदाताओं को प्रभावित करने के उन्हें पैसे,
शराब,दैनिक उपभोग की वस्तु आदि देने का प्रयास
करते हैं ताकि वे मतदाताओं को प्रभावित कर सकें।
इसके अलावा वो मतदाताओं से झूठे वादे भी करते हैं या फिर बड़ी बड़ी घोषणाएँ
करते हैं जो बाद में पूरी नहीं होती। और ऐसा बहुत बड़े स्तर पर होता है। अक्सर
पार्टियाँ चुनावों में राजनीतिक घोषणापत्र जारी करती हैं जिनमें ढेर सारी
लोकलुभावन बातों का ज़िक्र रहता है जिसे वो पूरी नहीं करती।
इसके अलावा कई जगहों में बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाएँ भी प्रकाश में
आई हैं। जहाँ कोई बाहुबली या असामाजिक तत्व सुरक्षा खामियों का फायदा उठाकर किसी
विशेष राजनीतिक दल के व्यक्ति को फायदा पहुँचाने का प्रयास करते हैं। अब जब इवीएम से
बूथ कैप्चरिंग नहीं हो पा रही है तो कुछ राजनैतिक पार्टी इवीएम का पुरजोर विरोध कर
रही है | ये सारी घटनाएँ भी राजनीति के गिरते
स्तर को प्रतिबिंबित करती है।
निष्कर्ष
भारत के गिरते राजनीतिक स्तर को देखते हुए आज़ के युवापीढ़ी और जनता
को चाहिए कि वो शिक्षित,संगठित और जागरूक हों। अच्छे और पढ़े
लिखे युवा राजनीति में आए क्योंकि अगर इस राजनीतिक दलदल से उन्हें कीचड़ साफ करना
है तो उन्हें इस दलदल में उतरना ही होगा। वो एक अच्छी, ईमानदार
और सशक्त सरकार चुनें….. जो हमेशा जनहित में कार्य करे तथा
भ्र्ष्टाचार और घोटालों से दूर रहे। और ये सब होगा सरकारी कार्यों में पारदर्शिता
लाकर जिससे वो आसानी से जनता से जुड़ सकें और कार्य में अनियमितता होने की सम्भावना
कम से कम हो जाए। मौजूदा दौर मे सरकार ने कुछ कदम उठाए है, जनता
ने भी सरकार का सहयोग भी दे रही है किन्तु अभी कुछ कार्य बाकी है, किन्तु जनता को अभी और जागरूक होना बाकी है व सरकार को कुछ और कदम उठाने बाकी
है| तो आइये देश की राजनैतिक स्तर को सुधारने के लिए कुछ और प्रयास
करते है, क्या आप साथ है ?
यदि आप के पास कुछ और जानकारी या सुझाव हो तो हमारे पाठको के साथ साझा
करना मत भूलिएगा |












