।। आधुनिकता के दौर से लड़ता ये मानसून ।।

Messy weather expected as Environment Canada issues rainfall warning यूँ तो कहने को मानसून पर्यावरणीय जीवन मे एक नए सूर्योदय की तरह है जो अपने साथ अनेको आशाएं उम्मीदे लेकर आती हैं परंतु मानों जैसे अभी इस शहर का सूर्य-उदय ही नही हुआ हो न ही उसकी लालिमा तनिक भी दिखाए देती थी  -दिखती थी तो सिर्फ सूखी धरती और प्यासा आसमान

और दोनों एक दूसरे को निहारते हुए शायद यही कर रह होंगे कि - सूखी धरती आसमान बाकी है अब तो बस इंसानो का इम्तेहान बाकी है -

और हो भी क्यो न जिस तेजी के साथ मानवीय कृतो द्वारा पर्यावरण को ये आमानवीय आघात पहुँचाया जा रहा है उससे मानसून तो क्या स्वयं प्रकृति भी अचरज में है ,जिस प्रकार से नित-प्रतिदिन पर्यावरण पर पड़ रहे आधुनिकता की चोट से निरंतर प्रहार किए जा रहे हैं उससे तो वास्तव में यह समस्त सृष्टि खतरे में है -

और यह भी सत्य है कि प्रकृति हर व्यव का हिसाब लेती है 'आधुनिकता के इस दौर से लड़ता ये मानसून' उसी हिसाब का ही तो हिस्सा है -

आधुनिकता व सौन्दर्यीकरण के नाम पर प्रकृति का जो चीरहरण हुआ है उसके आगे तो यह कुछ भी नही

बड़े चौराहे और एक टक लंबी सड़को का यह दौर इंसानो को सच से अंधा कर रही है -

UN: Environment is a deadly, worsening mess, but not hopelessथोड़ी सी जनसुविधाओं के नाम पर जो ये बड़े-बड़े पेड़ पौधों वृक्षों की कटाई का ये प्रचलन तेजी से उभर रहा है और यह इंसानो द्वारा जो प्रकृति के साथ आंखमिचौली खेली जा रही है वास्तव में उससे प्राकृतिक संतुलन काफी तेजी के साथ अपना रुख बदल रही है -

जोकि आज़ के दौर में अत्याधिक गर्मी-सर्दी,मानसून में देरी ,वर्षा की कमी,व भयंकर विभिन्न-2 बीमारियों का साया - यह सूचक ही नही अपितु प्रकृति की चेतावनी भी है,

पर इन सब बातों से क्या आधुनिकता के दौर में मानो ये सब मिथक हैं -

पर सच तो यह है कि प्राकृति की चोट से तो वैज्ञानिकता भी खुद को लाचार पाती है यह तो उसने भी स्वीकारा है

 प्राकृतिक आपदा का प्रकृतिक संरक्षण ही तोड़ है और बचाव भी जैसे लोहा-लोहे को काटता है -

परंतु आज ये 'आधुनिकता से लड़ता ये मानसून' खुद ही कारण है इसका यहाँ के लोग यहाँ का सिस्टम, कार्यप्रणाली प्रर्यावर्णीय संरक्षण के प्रति इस शहर की जागरूकता व इसकी नीति स्वयं में ही सब दोषी हैं -

नदी,नाले,पोखर,तालाब,झील,झरनों का इतनी तेजी से विलुप्त होना मानो ये कल की नही शदियों पुरानी बात रही हो और इनकी जगह लेते विकशित,विकासशील,और आधुनिकता का सूचक बने आज के ये आर्टिफिसियल जलाशय,स्वीमिंग पूल,फौहारे,वाटर फन पार्क इत्यादि यह स्मार्ट सिटी को दर्शाते हैं -

World Environment Dayचौड़ी सड़कें बड़े-बड़े चौराहें और उन पर बड़े-बड़े पेड़ पौधों वृक्षो की जगह लेते आज के आधुनिक गमलों में लगे छोटे छोटे पौधे जो स्वयं आज के इस अति प्रदूषित वातावरण में ख़ुद को जिंदा रखने की जदोजहद करते नजर आते है -

भला वो बेचारे इस विशालकाय शहर को क्या महफूज रखेंगें?

परतुं इस अंधी आधुनिकता की विचारधारा से इस शहर को मानसून से क्या मतलब वो तो प्रकृति का काम है परंतु सत्य ये भी है कि ' कि घोड़े की घास से बैर उसे स्वयं भूखा रखती है ' नदियों में जल की कमी,तालाबो का विलुप्त होना, नाले, नहरों को ढक कर रखना और वृक्षों की अत्यधिक कटाई इत्यदि इन तमाम प्रकृति आहारों के श्रोतों  को इन शहरियो द्वारा नष्ट करना ये स्वयं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने व धोड़े का घास से बैर नही तो क्या हैं ?

और ये सब तब जब हमारी अधिक्तर कार्य प्रणाली मानसून पर ही निर्भर हो किसानों की फसल की बुआई,निराई कटाई, शहरों के प्रदूषण को खत्म करने का एक मात्र प्राकृतिक साधन, वर्षा का कारण, और वातारण में संतुलन बनाये रखने में मददगार ये एकमात्र विकल्प ये वृक्ष ,नदी, तालाब ,नहरे इत्यादि और इन पर निर्भर ये मानसून एक दूसरे के पूरक ही तो हैं जैसे एक सिक्के के दो पहलू -

बैरहाल हाल ही में हुई बारिश की चंद बूंदों ने शहर को थोड़ी सी आस तो दी हैं मगर बौछारों की सुकून अभी भी कोशों दूर प्रतीत होती है आशा है कि हम उम्मीद की इस लौ को बुझसे से बचाएंगे और इसे तीव्रता भी हम ही प्रदान करेंगें क्योकि यह हमें सदैव स्मरण होना चाहिए कि मानसून ही हमारे जीवन का एकमात्र प्राकृतिक रिफ्रेशमेंट है ।।

आप बताइये मानसून की हल्की बारि का आप मजा ले रहे है कि नही गर्म पकोडे व चाय के साथ?

विशाल मिश्रा - प्रयागवासी