" मन की चेतना "

जब हमने जीवन देखा भी नहीं था और ना ही जन्म लिया होता है, तब वह खुशी हमारे माता-पिता के जीवन को खुशहाल बना देती है वह उनकी ममता ही होती है जो एक अदृश्य बंधन को जोड़ देती है और साथ ही वह भाई बहनों के रिश्ते जो हमारे जन्म लेने के बाद और सब कुछ समझने की जो कलियां धीरे-धीरे खिलती हैं जोकि हर दिन हमे अपनों के होने का नया एहसास दिलाती हैं -

 उनके छांव में जिंदगी क्या है ! जो बढ़ते हुए हर कदमों को अनोखा बनाती है यह मै कोई नई बात नहीं बता रही है यह तो हर वह इंसान के लिए है जिसे ईश्वर ने जन्म देकर अनमोल रिश्तो का भागीदार बनाया है जब हम किसी घटना से धिर जाते हैं तो वही रिश्तों के बंधन हमे मनोबल के रूप में सहारा देते हैं -

 यह भी संभव है कि उन रिश्तो से हमें कभी कष्ट भी मिलता है परंतु हमारा मनोबल नही टूटता है हम फिर भी उस ममता भारी नदियों में खेलते कूदते रहतें है और निरंतर आगे बढ़ते हैं -

बाहर की दुनिया जो यह एक समाज वर्ग कहलाता है जहां हमे अच्छे और बुरे हर प्रकार के प्राणी मिलते हैं जिसे जीवन जीने की सीख की "संज्ञा" कहीं गई है -

 परंतु यह जड़रूपी ताकत कहां से आ जाती है ! जो रिश्ते हमारे साथ है और मनोबल के रूप में हमेशा दूर रहकर भी हमे ताकत प्रदान करते है, परंतु कुछ अनजान रिश्ते अचानक हमारे संपर्क में आकर या अन्य किसी खास वजह से हमे वो इतना कमजोर बना लेते हैं कि हम अपनी जिंदगी को सिर्फ अपना ही अधिकार समझ कर इस अनमोल जीवन को आत्महत्या की तह तक ले जाते हैं क्या यह सही है ,खुद को स्वयं ही समाप्त करना ?

 जिंदगी को समाप्त करने से पहले भला कोई यह क्यों नहीं सोचता कि इस जीवन पर हमसे भी पहले और भी कई हमारे अपनो का अधिकार होता है , परंतु जीवन पर पूर्णतः स्वतः अधिकार वाली सोच ही किसी भी मनुष्य को आत्महत्या जैसी घटना के लिए सदैव सफल बना देती है -

 यह चिंतन का विषय है कि यह कैसा मनोबल है जो मनुष्यों में इस रूप में प्रस्तुत होता है !

  परंतु वास्तव में किसी भी आत्महत्या में सिर्फ किसी व्यक्तिविशेष की ही नही हत्या नही होती बल्कि सच तो यह है कि उससे जुड़ें तमाम रिश्ते उसके शूली पर चढ़ते ही एक-एक कर के उसके गिरते साँसों के साथ ही उन तमाम रिश्तों का भी दम घूट जाता है -

उससे जुड़े तमाम लोगों की जिंदगी तो रहती है परंतु उनके जीवन में सिर्फ अंधकार ही रह जाता है हर पल आत्महत्या का द्वंद झेलता जीवन इस प्रकृति के साथ चलता तो रहता है परंतु यह समीम दर्द जीवन भर जिंदा रह रहे अपनो को कुरेदता रहता है -

 हमे यह समझना चाहिए कि यह मनुष्य का जीवन बहुत ही अनमोल है ईश्वर ने हमे स्वयं को इसे बहुत सुंदर बनाने के लिए दिया है ना कि खुद के लिए बल्कि समस्त समाज के लिए भी -

 परेशानी कितनी भी विकट क्यो न हो हमे उसे अपने सूझबूझ से समाप्त करना चाहिए हमे यह समझना होगा कि हमारा यह जीवन ईस्वर द्वारा  दिया हुआ दान स्वरूप मिला है हमे इसका अपमान करना नहीं चाहिए -

  जीवन को समाप्त करने से पहले आप ने कितने अपने रिश्तों की हत्या कर डाली यह सोचकर आप अपनी जिंदगी को बचा सकते हैं , कई बार अपनों के बारे में सोचने से आपका निर्णय बदल जाए और आप पुनः अपनों को सोचकर आप फिर से मनोबल की चोटी को पकड़ ले जिंदगी फिर से ख़ुशनुमा बन जाए और जीवन से आत्महत्या की सोच की प्रवित्ति का पूरी तरह से अंत हो जाए वो वास्तव में जीवन की सबसे बड़ी सफलता का यही प्रत्यक्ष प्रमाण होता है -

 और जीवन मे आने वाली छोटी-मोटी मुसीबतों से हमे घबराना नही है बल्कि उसे डटकर मुकबला करना है -

 क्योकि हमने देखा है समंदर की बड़ी-बड़ी लहरों से टकराते हुए छोटी-छोटी कश्तियों को भी समंदर पार करते -

 इसलिए अपनी बातों को सदैव ताकतवर शब्दों से प्रस्तुत करने का प्रयास करो तो यह आत्महत्या जैसे घटित होने इनकी अमानवीय घटनाओ का स्वतः ही आत्मबल टूट जाता है ,किसी विषम परिस्थितियों के सामने आपका अपना दृहनिश्चिय आपकी प्रबल इच्छाशक्ति ही आपकी जीत की अगुवाई करती है व इन्ही संकल्प से आप स्वयं को व इस जीवन को सिद्घ व सफल बना सकते हैं 

और इसलिये हमे ये सदैव स्मरण रहना चाहिए कि -

 रात कितनी भी काली क्यों ना हो सवेरा तो होना निश्चिन्त ही है ।। 

     ✍ :-अलका शर्मा जी