मित्रो सर्वप्रथम मै ये बताना चाहता हूॅ के मोदी सरकार के नये कृषि बिल पुर्णतया छोटे किसान (जैसे लेखक स्वयं) के पुर्णतया पक्ष मे है व उक्त कृषि बिल से बिचौलियो को काफी नुकसान है व उनकी संलिप्तता का अन्त हो जायेगा, जिस MSP के लिए सबसे ज्यादा विवाद है उसका कोई अन्त नही होने वाला है, हॉ प्राइवेट सेक्टर को कुछ मंजूरी दी गयी है जो छोटे किसान जो उचित संसाधन के अभाव मे उन्नत खेती नही कर सकते है उनके लिए वरदान साबित होगी क्योकि उक्त कृषि बिल के माध्यम से प्राइवेट सेक्टर की सीधी पहुॅच किसान तक होगी व प्राइवेट सेक्टर किसाने को उन्नत कृषि के तरीके व मशीनरी आदि उपलब्ध करायेगे जिसको माध्यम से छोटे किसानो की सबसे बडी समस्या ज्ञान व संसाधन की कमी का अन्त होगा।
दरअसल दोस्तो मौजूदा किसान आन्दोलन पुर्णतया कांग्रेस व देश विरोधी ताकतो द्वारा विशेषकर खालिस्तानी समर्थको व शाहीन बाग समर्थको अर्थात देश तोडो अभियान के समर्थको द्वारा प्रायोजित है, क्योकि मौजूदा आन्दोलन मे जिस प्रकार खालिस्तान समर्थक व देश विरोधी नारेबाजी हुई है व शाहीन बाग समर्थको की संलिप्तता देखी व सुनी गई है, व पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा जिस प्रकार देश के गृहमंत्री से मुलाकात करने के बाद प्रेस से बात करते हुए कहा गया कि मौजूदा किसान आन्दोलन को शीघ्र समाप्त कराना आवश्यक है वर्ना ये देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, जिससे ये स्पष्ट होता है के माननीय अमरिंदर सिह कुछ गोपनीय तथ्यो को बिना उजागर किये मौजूदा किसान आन्दोलन के आगे की रणनीति व इसके भयावह स्थिति को अच्छी तरह से जानते व समझते है, साथ ही साथ जिस प्रकार काग्रेस के रणनितिकारो द्वारा उचित समय के पहले ही किसाने के निर्णय की घोषणा की जाती रही, वो भी काफी मौजूदा किसान आन्दोलन को संदेहास्पद बना देता है।
साथ ही साथ जिस प्रकार देश विरोधी विशेषकर खालिस्तान समर्थित विषयवस्तु जैसे खालिस्तान समर्थित पोस्टर नारेबाजी व शाहीन बाग की संलिप्तता जैसे लगभग सभी शाहीनबाग व आजादी गैग जैसे दादी जी, ओखला के आम आदमी पाटी विधायक, व शाहीन बाग के जाने माने चेहरे का इस आन्दोलन मे जिस प्रकार सक्रिय भागीदारी निभाई है व देश विरोधी बयान लगे है जिससे ये पुर्णतया स्पष्ट है के देश विशेषकर पंजाब के किसान भाईयो को कुछ देश विरोधी व राजनैतिक तत्व गुमराह कर अपने निजी स्वार्थ के लिए उपयोग कर रहे है, जिससे बाद मे निष्पक्ष, ईमानदार, मासूम व सदाचारी किसान खुद को छला हुआ महसूस करेगे जैसे काला धन के विरोध मे अन्ना हजारे जी आन्दोलन किये किन्तु उसका फायदा माननीय अरविन्द केजरीवाल जी उठा लिये व अन्ना हजारे जी स्वयं को छला महसूस कर एकांतवास मे जीवनयापन कर रहे है व उनके परिश्रम के बल पर अरविन्द केजरीवाल जी दिल्ली के मालिक बन गये है।
सवाल तो ये भी उठता है कि जो पंजाब का किसान हरियाणा और उसके किसानों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूदSYL के पानी की एक बूंद तक देने को राजी नहीं, खुदी खुदाई नहरें भर देते है, जिस कारण दक्षिण हरियाणा के किसानो की फसल सूखे की मार से बर्बाद हो जाती थी, आज वो ही पंजाब के किसान बडी बेशर्मी के साथ हरियाणा और उसके किसानो से भाईचारे की बात कह रहे है। तब तो यही पंजाब के किसान पाकिस्तान में पानी भेजकर अपना भाईचारा निभा लेते थे, और अब भी डायरेक्ट-इनडाइरेक्ट उनके ही रहमों करम पर ये तथाकथित किसान आंदोलन चल रहा है।
पंजाब के मुख्यमंत्री माननीय अमरेंद्र सिंह ने खुद कबूला था कि ISI किसान बिल के ज़रिए दोबारा खालिस्तान आंदोलन को हवा दे सकती है। यही सब पिछले दिनों पराली जलाने के दौरान हुआ था, जब हरियाणा और उत्तर प्रदेश इसपर लगाम लगा सकते हैं, तो पंजाब क्यों नहीं, क्योंकि वहां पंथक राजनीति को इस आंदोलन के बहाने दोबारा जगाने की कोशिश है। सही अर्थों में इस आंदोलन को पकड़ेंगे तो पाएंगे कि पंजाब की कांग्रेस सरकार खालिस्तान आंदोलन को भड़काकर इस किसान आंदोलन को मजबूती दे रही है क्योंकि कांग्रेस के लिए मोदी विरोध किसी भी कीमत पर जायज है भले ही वो खालिस्तान का नाम भड़काकर किया जाए।
इस आंदोलन का किसानो से कोई वास्ता नहीं है, ऐसा होता तो देश के सब राज्यों में खेती होती है, वहां भी यही सब हो रहा होता, पंजाब का किसान पंथक राजनीति के भंवर में फंसकर इस आंदोलन को हवा दे रहा है तो हरियाणे में जाति विशेष की वजह से इस आंदोलन को थोड़ी बहुत हवा मिल रही है, कल हुड्डा को मुख्यमंत्री बना दो, हरियाणा में ये आंदोलन बिल्कुल बैठ जाएगा।
मौजूदा समय के केन्द्र सरकार पंजाब के किसानो से कई बार वार्ता कर चुकी है, व अभी कोई हल नही निकल सका है,
किसानो की सबसे बडा डर के MSP इस कृषि कानून से खत्म हो जायेगी, इस पर केन्द्र सरकार के कई गणमान्य मंत्रियो द्वारा पुर्णतया आश्वस्त करने की कोशिश की गई, केन्द्र सरकार लिखित मे आश्वासन देने को तैयार है किन्तु किसान की मॉग है के सरकार कानून बनाये के उसकी समस्त फसल MSP पर ही खरीदी जायेगी व इसका उल्लघन करने वालो पर सजा का प्रावधान हो जो पुर्णतया गलत है क्योकि आप स्वयं निर्णय करे उदाहरण स्वरूप आलू के कई किस्मे होती है व पुराना आलू व नये आलू के मूल्य भी अलग होते है व अच्छे व खराब आलू के मूल्य मे भी अन्तर होता है किन्तु सरकार यदि किसानो की ये मॉग मान ले तो सडा आलू या अच्छा आलू दोनो का मूल्य समान होगा तो बोलिये क्या आप अच्छे आलू के मूल्य पर आप मेरे खराब व सडे आलू खरीदेगे? नही ना । साथ ही सरकार यदि इस मॉग को मान ले तो सरकार तो अपने सभी खर्चे बन्द कर केवल किसानो की ही फसल डैच् के मूल्य मे खरीदने के लिए समस्त बजट खर्च करना पडेगा क्योकि 135 करोड की आबादी मे हमारा देश कृषि प्रधान है जो असम्भव है ।
किसाने की मॉग यह भी है कि नये कृषि कानून मे किसी प्रकार के किसानो के विधिक विवादो पर सही प्रकार से विचार नही किया गया, जिसके लिए सरकार ने स्पष्ट रूप से किसानो को आश्वस्त किया के इस पर विचार किया जायेगा। सरकार ने अपनी तरफ से एक पहल करनी की भी कोशिश की के एक कमेटी बनाई जाये जिसमे सरकार, कृषि विशेषज्ञ व किसान नेताओ की सीमित संख्या मे शामिल हो जो किसानो की समस्त परेशानी, चिन्ताओ पर मंथन करे साथ ही साथ किसाने के लिए उचित नितीयों पर भी चर्चा करे जो मौजूदा समय मे शायद केन्द्र सरकार द्वारा नये कृषि कानून मे नही सम्मिलित किया गया, किन्तु ये काफी आश्चर्यजनक तथ्य है के किसानो व सरकार के बीच की वार्ता समाप्त होने के पूर्व काग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला जी द्वारा टवीटर पर ट्वीट किया गया कि वार्ता विफल, बिना नये कृषि कानून के निरस्त किये बिना किसान नही मानेगे, सवाल इस ट्वीट से उठता है के बिना इस वार्ता मे सम्मिलित हुये काग्रेस प्रवक्ता को कैसे समय से पूर्व इस तथ्य का ज्ञान हुआ साथ ही साथ वार्ता समाप्त होने के बाद किसान नेताओ का भी यही बयान रहा, जिससे स्पष्ट होता है कि काग्रेस का इस किसान आन्दोलन मे संलिप्तता है, जो इस आन्दोलन को संदेह के घेरे मे लाता है ।
एक किसान होने के नाते मै इस किसान आन्दोलन का विरोध करता हूॅ साथ ही साथ केन्द्र सरकार से आग्रह करता हूॅ किसानो को सही तरीके से अपने विश्वास मे लेकर उनकी संभी चिन्ताओ का निवारण करे, किन्तु साथ ही साथ उक्त आन्दोलन मे जुडे देश विरोधी तत्वो पर भी उचित कारवाई करे। किन्तु मौजूदा कृषि कानून को किसी भी कीमत पर समाप्त न करे क्योकि यदि केन्द्र सरकार यदि ऐसा गलती से भी करती है तो उसे जल्द ही हम जैसे किसानो के आन्दोलन का सामना भी करना पड सकता है जो इस कानून के पक्ष मे है, ये स्पष्ट है कि नये कृषि कानून के विरोधी मात्र पंजाब के किसान व कुछ अन्य किसान संगठन है किन्तु इस कृषि कानून के पक्ष मे सम्पूर्ण भारत के छोटे किसान है यदि वो रास्ते मे यानि दिल्ली मे आ गये तो दिल्ली ही क्या स्वयं पंजाब, हरियाणा दिल्ली जैसे 5.6 राज्यो मे पैर रखने की भी जगह नही बचेगी जिसकी जिम्मेदार स्वयं केन्द्र सरकार होगी।
सत्ता को कभी-कभी कुछ जगहो पर निर्मम भी होना पडता है जैसे एक पिता अपने बच्चे की अनर्गल मॉग को नकारता है व जब बच्चा उस वस्तु की जिद करने लगता है तब मजबूरन उस पिता को थोडा बल प्रयोग भी करना पडता है। सत्ता मे बैठे नेताओ का यही आचरण होना चाहिए, किसाने की चिन्ताओ का सही व विश्वास पुर्वक निवारण करे, चाहे इसके लिए जो भी समय लगे किन्तु उनकी अनावश्यक व अनर्गल मॉगो को भी सरकार को सिरे से नकारने की आवश्यकता है।
आप बताईये क्या किसान भाईयो व सिक्खो के सम्मान के लिए आप भी क्या इन देश विरोधी व राजनैतिक तत्वो के खिलाफ खडे है ?
आप बताईये मौजूदा किसान जो पूर्णतया किसान हित मे है, क्या उसका विरोध उचित है?
आप बताईये किसान आन्दोलन की आड मे खालिस्तानी व शाहीन बाग का देश विरोधी एजेण्डा चलाना सही है? क्या आप इसका विरोध करेगे?
आप बताईये आखिर क्यो मात्र पंजाब के ही किसानो को नये कृषि बिल से आपत्ति क्यो है? क्या मात्र पंजाब मे ही किसान खेती करते है, शेष भारत मे नही?




